La Niña outbreak in India भारत में सर्दियों की दस्तक अब तेज़ी से महसूस की जा रही है। नवंबर की शुरुआत के साथ ही कई राज्यों में न्यूनतम तापमान 10 डिग्री सेल्सियस से नीचे पहुंच चुका है।

भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने चेतावनी जारी करते हुए कहा है कि इस साल सर्दी सामान्य से ज्यादा ठंडी और लंबी रह सकती है। इसके पीछे प्रमुख कारण है La Niña (लानीना) — प्रशांत महासागर में बनने वाला एक मौसमीय पैटर्न जो दुनिया के मौसम को प्रभावित करता है।
क्या है La Niña?
La Niña एक जलवायु घटना है जिसमें प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी भाग का तापमान सामान्य से कम हो जाता है। यह घटना El Niño के विपरीत होती है और इसे ENSO (El Niño–Southern Oscillation) चक्र का हिस्सा माना जाता है। जब La Niña सक्रिय होती है, तो भारत में आम तौर पर मानसून अच्छा रहता है, लेकिन सर्दियां अधिक ठंडी और शुष्क होती हैं।\
तापमान में गिरावट – किन राज्यों में दिखा असर
IMD के ताज़ा रिपोर्ट्स के अनुसार:
- मध्य प्रदेश के इंदौर में तापमान 7°C तक गिर गया — यह पिछले 37 वर्षों में नवंबर की सबसे ठंडी रात रही।
- बिहार और झारखंड में भी सर्दी ने दस्तक दे दी है; कई इलाकों में तापमान 10°C से नीचे दर्ज हुआ।
- विदर्भ (महाराष्ट्र) के गोंदिया में न्यूनतम तापमान 11.5°C, जबकि नागपुर में 14.4°C रहा।
- राजस्थान, दिल्ली-एनसीआर, उत्तर प्रदेश और हरियाणा में आने वाले दिनों में ठंड और बढ़ने की संभावना है।
- IMD ने अनुमान जताया है कि नवंबर के अंत तक उत्तर भारत में कोल्ड-वेव (Cold Wave) की स्थिति बन सकती है।
La Niña के असर से क्यों बढ़ेगी ठंड
मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि La Niña के दौरान:
ठंडी हवाएं हिमालयी क्षेत्रों से मैदानों की ओर तेजी से बढ़ती हैं।
पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances) अधिक सक्रिय हो जाते हैं, जिससे उत्तर भारत में ठंड-लहर और धुंध की स्थिति बनती है।
उत्तर-पूर्वी मानसून भी सक्रिय रहता है, जिससे दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में बारिश बढ़ जाती है।
इस बार La Niña के असर से उत्तर और मध्य भारत में दिसंबर-जनवरी के दौरान औसतन से अधिक ठंड पड़ने की संभावना है।
आम जनता के लिए सावधानियां
IMD और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार:
- बुजुर्गों और बच्चों को ठंड से बचाने के लिए गरम कपड़े और हीटिंग इंतज़ाम रखें।
- सुबह और रात के समय बाहर निकलते समय विशेष सावधानी बरतें।
- किसान फसल पर ठंड-लहर के असर को देखते हुए खेतों में सिंचाई और मल्चिंग जैसी तकनीकें अपनाएं।
- अपने क्षेत्र के IMD अलर्ट्स को नियमित रूप से देखें।